- परमेश्वर के वचनों का एक भजन
- सृष्टिकर्ता के अधिकार का असली मूर्त रूप
- I
- दुनिया और इंसान की नियति,
- रचयिता के प्रभुत्व से जुड़ी है गहराई से,
- अलग हो नहीं सकती रचयिता के आयोजन से,
- अटूट बंधन है इसका रचयिता के अधिकार से।
- तमाम चीज़ों के कानूनों से समझता है इंसा,
- रचयिता के आयोजन और सत्ता को;
- जीवित रहने के नियमों से महसूस करता है इंसा,
- परमेश्वर के शासन को;
- II
- चीज़ों की नियति से वो नतीजे निकालता है,
- रचयिता जिस तरह अपनी सत्ता का उपयोग करता है,
- उन्हें काबू में रखता है;
- इंसानों और चीज़ों की ज़िंदगी के चक्र में,
- चीज़ों और जीवों के लिये इंसा,
- रचयिता के आयोजन और प्रबंधन की अनुभूति करता है,
- और गवाही देता है, किस तरह वो आयोजन,
- और प्रबंधन, ऊँचे उठ जाते हैं दुनियावी कानूनों से,
- नियमों, व्यवस्थाओं से, और ताकतों और शक्तियों से।
- इंसा इसकी रोशनी में, मानने को विवश है,
- कोई सृजित प्राणी, परमेश्वर की सत्ता को भंग नहीं कर सकता,
- कोई ताकत दख़ल दे नहीं सकती, न बदल सकती, किसी घटना,
- किसी भी चीज़ को, जो कर दिया निश्चित रचयिता ने।
- इन्हीं दिव्य नियमों और कानूनों के तहत,
- पीढ़ी-दर-पीढ़ी, इंसान और हर चीज़ रहती है और बढ़ती है।
- क्या ये सृष्टिकर्ता के अधिकार का, असली मूर्त रूप नहीं है?
- "वचन देह में प्रकट होता है" से
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